IC38 Hindi Chapter Notes 5

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अध्याय 5   बीमा अनुबंध के कानूनी सिद्धांत


बीमा अनुबंध – भारतीय संविदा अधिनियम 1872 के अनुसार , बीमा पॉलिसी दो  पक्षों , बीमा कंपनी और बीमित (पॉलिसी धारक) के बीच एक अनुबंध है।

किसी भी अनुबंध को वैध अनुबंध होने के लिए उसमें निम्नलिखित तत्व होने चाहिए –

1) प्रस्ताव और स्वीकृति – दो पक्षों में से एक को पेशकश करनी चाहिए और अन्य को उसे स्वीकार करना चाहिए। आमतौर पर पेशकश प्रस्तावक (पॉलिसी धारक) द्वारा की जाती है और स्वीकृति बीमा कंपनी द्वारा की जाती है।

2) विचार – पॉलिसी धारक द्वारा देय प्रीमियम और बीमा कंपनी द्वारा क्षतिपूर्ति का वादा विचार के रूप में जाना जाता है।

3) पक्षों के बीच समझौते – दोनों पक्षों को एक ही बात पर सहमत होना चाहिए।

4) स्वतंत्र सहमति –  पॉलिसी लेते समय प्रस्तावक पर कोई दबाव नहीं होना चाहिए। सहमति तब मुक्त मानी  जानी चाहिए जब पालिसी जबरन, अनुचित प्रभाव; धोखा; गलत बयानी; गलती से नहीं ली जानी चाहिए।

5) दलों की क्षमता – प्रस्तावक को कानूनी रूप से सक्षम होना चाहिए। अर्थात उसे मानसिक रूप से स्वस्थ होना चाहिए तथा  कानून द्वारा अयोग्य नहीं करार होना चाहिए तथा उसे नाबालिग नहीं होना चाहिए।

6) वैधता – अनुबंध की वस्तु कानूनी होना चाहिए।

बीमा अनुबंध की विशेष सुविधाएँ

1) परम सद्भाव (या) (Uberima Fides)  – इसका तात्पर्य  है कि अनुबंध से सम्बद्ध हर पक्ष को बीमा की विषय वस्तु से संबंधित समस्त तथ्यात्मक जानकारी होनी चाहिए, चाहे उन्हें पुछा गया हो या नहीं ।

2) तथ्यात्मक सूचना – प्रस्तावकों के परिवार के इतिहास; चिकित्सा का इतिहास; वित्तीय ब्यौरा ; व्यावसायिक ब्यौरा ; बीमारी यदि कोई हो ;  आदि को तथ्यात्मक जानकारी कहा जाता है।

उत्तम अच्छा विश्वास का उल्लंघन:

गैर प्रकटीकरण – कुछ विवरण को नहीं बताना।

छिपाव – जानबूझकर विवरण को छुपाना।

मिथ्यकथन-

  1. a) अज्ञान/मासूम – अज्ञानतावश गलत जानकारी देना
  2. b) धोखाधड़ी – जानबूझकर गलत जानकारी देना।

3) बीमा योग्य ब्याज – यह प्रस्तावक  का अपने से सम्बद्ध लोगों/वस्तुओं  अर्थात स्वयं , पति या पत्नी; माता-पिता; मकान; कार आदि को बीमायोग्य  ब्याज के रूप में मन जाता है।

  • जीवन बीमा में   –  बीमा योग्य व्याज  पालिसी की शुरुवात में होना चाहिए
  • गैर-जीवन बीमा में – बीमायोग्य हित शुरू में और के दावे  दोनों के दौरान विद्यमान  होना चाहिए
  • समुद्री बीमा में – बीमायोग्य  ब्याज दावे के समय मौजूद होना चाहिए।

4) आसन्न खण्ड – यह विभिन्न गतिविधियों के पीछे  मुख्य कारण है तथा इससे कोई भी घटना हो सकती है .

नि: शुल्क देखो- अवधि (या) कूलिंग ऑफ़ अवधि – अगर किसी प्रस्तावक  को एक पालिसी के अनुबंध करने के बाद वह या तो उसे  रद्द या तो पॉलिसी को अस्वीकार करना  चाहता है   तो वह पालिसी प्राप्त करने से 15 दिनों के भीतर इस संधर्भ में निर्णय ले सकता है।

  1. फ्री लुक-इन अवधि (या) कुलिंग ऑफ अवधि – यदि प्रस्तावक संविदा करने के बाद अर्थात पालिसी लेने के बाद उसे निरस्त या अस्वीकृत करना चाहता है तो इस संदर्भ में वह पालिसी लेने के बाद 15 दिन के भीतर अस्वीकार कर सकता है।

6) क्षतिपूर्ति – इसका मतलब है कि पॉलिसीधारक, जो नुकसान भुगत रहा है, उसे उतना  मुआवजा दिया जाता हैं  जिससे  वह  पुरानी वित्तीय स्थिति में अर्थात नुकसान से पूर्व की घटना में आ जाये ।

7) प्रस्थापन: यह वह प्रक्रिया है जो एक बीमा कंपनी द्वारा  एक लापरवाह तीसरी पार्टी से एक पॉलिसी धारक को भुगतान किया दावा राशि की वसूली के लिए उपयोग किया जाता है

 

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