IC38 Hindi Chapter Notes 1


अध्याय 1


बीमा का परिचय

बीमा – सरल भाषा में इसका अर्थ है उसे जोखिम का  हस्तांतरण करना  जो इससे निपटने में सक्षम है और यह  सामान्यता बीमाकर्ता (बीमा कंपनी) होता है।

  1. A) जीवन बीमा इतिहास और विकास: –

बीमा कारोबार का उद्भव लंदन के “लॉयड कॉफी हाउस” से हुआ ।

दुनिया की प्रथम जीवन बीमा कंपनी  अमिकेब्अबल सोसाइटी फॉर पेरपेटूअल असोरंस थी।

भारत की प्रथम जीवन बीमा कंपनी ओरिएंटल लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि. थी।

भारत में स्थापित प्रथम गैर-जीवन बीमा कंपनी ट्राइटन इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड थी।

भारत की प्रथम बीमा कंपनी बंबई म्युचुअल असोरेंस सोसायटी लिमिटेड थी जिसे मुंबई में 1870 में स्थापित किया गया था।

भारत की सबसे पुरानी बीमा कंपनी  नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड है जिसे 1906 में स्थापित किया गया था।

1912 में, जीवन बीमा कंपनी अधिनियम और भविष्य निधि अधिनियम बीमा व्यवसाय को विनियमित करने के लिए पारित किए गए।

जीवन बीमा कंपनियों अधिनियम 1912 में प्रीमियम की दर की टेबल और आवधिक मूल्यांकन को अनिवार्य कर दिया गया तथा उसे एक मूल्यांकनकर्ता द्वारा प्रमाणित किया जाना आवश्यक कर दिया गया।

बीमा अधिनियम 1938 में भारत में बीमा कंपनियों के संचालन को विनियमित करने के लिए अधिनियमित प्रथम कानून था।

जीवन बीमा कारोबार 170 बीमा कंपनियों और 75 प्रोविडेंट फंड सोसाइटी को मिलाकर 1 सितंबर 1956 को राष्ट्रीयकृत किया गया था और भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) का गठन किया गया था।

गैर-जीवन बीमा कारोबार का 106 बीमा कंपनियों को मिलाकर 1972 में राष्ट्रीयकरण किया गया था, और भारत में (जीआईसी) सामान्य बीमा निगम और इसकी 4 सहायक कम्पनियों का गठन किया।

मल्होत्रा ​​समिति और आईआरडीए: – मल्होत्रा ​​समिति – 1993 में विकास के लिए परिवर्तन के लिए गठित की गई और  इसने 1994 में रिपोर्ट प्रस्तुत की।

IRDAI – बीमा विनियामक और विकास अथॉरिटी ऑफ इंडिया को   आईआरडीए अधिनियम 1999 द्वारा जीवन और गैर-जीवन बीमा हेतु  एक सांविधिक नियामक निकाय के रूप में गठित किया गया।
जीवन बीमा उद्योग वर्तमान में: 1. a) भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी है। 2. b) निजी क्षेत्र में 23 जीवन बीमा कंपनियां हैं।

  1. c) डाक विभाग भी , भारत सरकार के अधीन जीवन बीमा कारोबार डाक जीवन बीमा के माध्यम से करता हो, , लेकिन नियामक के दायरे से मुक्त है।

बीमा कैसे काम करता है

एक परिसंपत्ति का आर्थिक मूल्य होना चाहिए (कार-शारीरिक, सद्भावना- गैर-शारीरिक, नेत्र व्यक्तिगत)। ये  परिसंपत्तियां अनिश्चित घटना के कारण मूल्य खो सकते हैं। यह हानि/क्षति  जोखिम के रूप में जाना जाता है। जोखिम का कारण खतरा (peril) के रूप में जाना जाता है।  समान जोखिम पूल (योगदान) वाले व्यक्ति एक साथ पैसे (प्रीमियम) का योगदान करते हैं।

जोखिम दो  प्रकार के होते  हैं

  1. a) जोखिम का प्राथमिक बोझ – वास्तव में हुआ घाटा, जैसे फैक्टरी में आग लगना।
  2. b) जोखिम का माध्यमिक बोझ- घाटा जो हो सकता है, जैसे शारीरिक / मानसिक तनाव ।

जोखिम प्रबंधन तकनीक: – तकनीक के विभिन्न प्रकार जो जोखिम का प्रबंधन करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं:

  1. जोखिम से बचाव – एक नुकसान की स्थिति से बचने के लिए जोखिम को नियंत्रित करना
  1. जोखिम प्रतिधारण – इसमें व्यक्ति जोखिम के प्रभाव का प्रबंधन करता है और जोखिम और इसके प्रभाव को सहन करता है।
  2. c) जोखिम की कमी और नियंत्रण – यह जोखिम परिहार की तुलना में अधिक व्यावहारिक और प्रासंगिक दृष्टिकोण युक्त है। इसका अर्थ है नुकसान और / या इसके प्रभाव की गंभीरता को कम करने के लिए या इस तरह के नुकसान हो जाने की घटना की संभावना को कम करते हैं।

बीमा एक जोखिम हस्तांतरण तंत्र है।

जोखिम प्रबंधन के लिए एक उपकरण के रूप में बीमा: – जरा के लिए बहुत अधिक जोखिम न लें. उदाहरण के लिए , एक बॉल पेन का बीमा करने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि इसका मूल्य बहुत अधिक नहीं है।

जितना नुकसान हम बर्दास्त नहीं कर सकते उससे अधिक जोखिम नहीं लेना चाहिए, जैसे हम अपने मकान का बीमा नहीं करने का जोखिम नहीं ले सकते क्योंकि हमारे मकान की कीमत बहुत अधिक है.

बिना सोचे समझे बीमा मत लें, क्या कोई अन्तरिक्ष उपग्रह का बीमा कर सकता है?

सोसायटी में बीमा की भूमिका:

  1. बीमा आर्थिक और सामाजिक रूप से समाज को लाभ पहुँचता है।
  2. यह रोजगार भी प्रदान करता है
  3. प्रीमियम से प्राप्त पैसा बुनियादी सुविधाओं की जरूरत के विकास के लिए निवेश किया जाता है.
  4. यह भय, चिंता और भविष्य के साथ जुडी चिंता को दूर करता है।

सरकार द्वारा प्रायोजित बीमा योजनायें

कर्मचारी बीमा निगम, फसल बीमा योजना (RKBY), ग्रामीण बीमा योजनाएं

बीमा कंपनी द्वारा संचालित और सरकारी योजनाओं द्वारा समर्थित नहीं

जनता व्यक्तिगत दुर्घटना, जन आरोग्य