बीमा

“बीमा, बीमा कंपनी और बीमा के बीच एक संविदा है . प्रतिफल के बदले में बीमा कंपनी को एक विशिष्ट घटना घटित होने पर एक विशेष राशि का भुगतान करने का वादा देती है . ”

बीमा प्रदाता यानी बीमा कंपनी और जिसके जीवन पर बीमा किया जाता है बीमित के रूप में जाना जाता है. जोखिम कवर(विशेष राशि) के लिये देय प्रीमियम का मतलब प्रतिफल है. विशेष राशि (सम एश्योर्ड) केवल निर्दिष्ट घटना पर देय होता है.पॉलिसी का खरीदार प्रस्तावक कहलाता है.
पुनर्बीमा

बीमा जोखिम के हस्तांतरण की प्रक्रिया पर काम करता है. जब एक व्यक्ति बीमा कंपनी को अपने जोखिम का स्थानांतरण करता है , बीमा होता है. जब एक बीमा कंपनी अपनी जोखिम वहन क्षमता से ज़्यादा जोखिम किसी दूसरी बीमा कंपनी को स्थानांतरित करती है उसे, पुनर्बीमा कहते हैं .पुनर्बीमा की गतिविधि में ग्राहक बीमा कंपनी होती है.

बीमा का विपणन

बीमा का विपणन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विपणन प्रणाली के माध्यम से किया जाता है. बीमा कंपनी और बीमित के बीच संविदा के समय जब कोई और नहीं होता, उसे प्रत्यक्ष विपणन प्रणाली कहते हैं। इंटरनेट प्रणाली, प्रत्यक्ष विपणन का नवीनतम विकास है . जब कोई संगठन / व्यक्ति एजेंट / कॉर्पोरेट एजेंट / बीमा दलाल के माध्यम से बीमा होता है उसे अप्रत्यक्ष विपणन के रूप में जाना जाता है. बीमा एजेंट बीमकर्ता का और दलाल एक ग्राहक का प्रतिनिधित्व करते हैं , लेकिन दोनो ही यानी बीमा कंपनी द्वारा दोनों को पारिश्रमिक दिया जाता है. बीमा एजेंट एक बीमकर्ता का प्रतिनिधित्व और दलाल कई बीमाकरता का प्रतिनिधित्व करता है और अनेक उत्पादों कि बिक्री एक साथ करता है।

जोखिम,

किसी भी घटना की अनिश्चितता जिससे कोई नुकसान हो उसे जोखिम कहते हैं। वो जोखिम जो सब पर समान हो और सबके नियंत्रण से परे हो उसे शुद्ध जोखिम कहते हैं। जोखिम जो किसी समूह विशेष पर ही बना हो उसे विशिष्ट जोखिम है।

जोखिम जो मौद्रिक मूल्य मे मापा जेया सके, वित्तीय जोखिम होता है। शुध, विशिष्ट और वित्तीय जोखिम बीमा योग्य जोखिम होते हैं। जोखिम को सबसे अच्छा प्रबंध उसे हस्तांतरित करना है- यानी बीमा।

जोखिम की पूलिंग

जोखिम पूलिंग से बीमा कंपनी जमा प्रीमियम की पूलिंग करके व्यक्ति का बीमा करते हैं। पूलिंग एक ही तरह के जोखिम की होती है. यानी जीवन बीमा का पूल और स्वास्थ्य बीमा का पूल अलग अलग बनाया जाता है।

बड़ी सख्या का सिद्धांत

येह बीमाकरता को मृत्यु दावे के आधार पर प्रीमियम तालिका बनाने मे सहायक होता है।

जोखिम और आपदाएं

कोई विशिष्ट घटना जिससे नुकसान हो उसे आपदा कहते हैं। और जोखिम वो कारक हैं जीससे आपदा के घटने की संभावना पर प्रभाव पड़े।

जैसे फेपडों के कॅन्सर मे धूम्रपान

नैतिक और भौतिक जोखिम

नैतिक खतरे व्यक्ति के शौक, आदतें और मानसिक स्थिति से होते हैं, जैसे शराब पीना, धूम्रपान, कार रेस कपट आदि। भौतिक जोखिम शारीरिक बीमारी या अपंगता है।

बीमा संविदा के मूलभूत तथ्य : प्रस्ताव और स्वीक्रति

स्वीक्रति स्वैच्छिक होनी चाहिये बिना किसी दबाव के, सशर्त स्वीक्रति को विपरीत प्रस्ताव कहतेहैं। बीमा कवर के मूल्य कोप्रतिफल कहते हैं। परम सदभाव का सिधांत और बीमाहित योग्य दो ऐसे सिधांत है जो बीमा संविदा के विशेष हैं।

परम सदभाव का सिधांत

बीमा संविदा प्रस्तावक के दिये हुए तथ्यों और डाटा पर आधारित होती है.प्रस्तावक को संविदा के समय सारी जानकारी सही और स्वेच्छा से बतानी चाहिये. गलत जानकारी संविदा को शून्य कर देगी।

व्यपगत पॉलिसी के पुनर्जीवन के समय ये सिधांत फिर से लागू होता. हालांकि पॉलिसी के प्रीमियम जमा करते समय जो पहले से ही प्रभाव मे हो, इसका कोई महत्वा नहीं है।

बीमाहित योग्यता का सिधांत

बीमा का दुरुपयोग रोकने के लिये, बीमा अधिनियम मे येह एक कानूनी मांग है कि प्रस्तावक का बीमित पर बीमाहित होना चाहिये। बीमा हित योग्यता कि परिभाषा कहीं लिखी हुई नहीं है, क्योंकि ये हालत पर और व्यक्तिपरक है। एक व्यक्ति के निजी जीवन पर बीमा हित असीमित होता है। पति- पत्नी, मा बाप, बच्चे, लेनदार -देनदार, भागीदार, कर्मचारी नियोक्ता, का vitteey नुकसान के बराबर बीमा हित योग्य होता है।किसी विशिष्ट कर्मचारी पर नियोक्ता द्वारा ली गयी पॉलिसी को मुख्य व्यक्ति बीमा कहते हैं और बहुत से कर्मचारियों पर ली गयी पॉलिसी को समूह बीमा कहते हैं। समूह बीमा के जोखिमांकन के समय जोखिमानकनकर्ता समूह कि आवसात आयु को ध्यान मे रखता है। बीमा हित योग्य कि कमी से संविदा शून्य हो जाती है। जीवन बीमा मे बीमा हित बीमा लेते समय होना चाहिये, सामुद्रीया बीमा मे दावे के समय और सामान्य बीमा मे दोनो समय होना चाहिये।


अविवाद्यता खण्ड (खण्ड ४५)

परम सदभाव के सिद्धांत के कारण बीमा करता को अधिकार है की पॉलिसी प्रारम्भ से अगले २ साल तक अगर प्रस्तावक द्वारा कोई जानकारी गलत पायी जाती है तो पॉलिसी निरस्त करके प्रीमियम भी ज़ब्त कर लिया जायेगा। छिपाये गये तथ्य सारभूत होना चाहिये।

सारभूत तथ्य:

बीमा संविदा मे बीमा करता को बीमित की मृत्यु पर दावा राशि देना पड़ती है, इसलिये वो तथ्य जो बीमित के मरने की संभावना को प्रभावित करते हैं, सारभूत तथ्य कहलाटe हैं।

आयु, कद, वज़न, प्रस्तावक और उसके परिवार की स्वास्थ्य इतिहास आदि को सारभूत तथ्य कहते हैं। आम जानकारी वाले तथ्य, कानूनी तथ्य, और वो तथ्य जिसका संविदा पर प्रभाव ना पड़े, उनकी जाने की कोई ज़रूरत नहीं है।

छतिपूर्ति का सिद्धांत :

इसमे बीमित को जितना वित्तीय नुकसान होता है उतना ही हर्जाना दिया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य ग्राहकों को बीमा से लाभ ना उठने देना है। येह सिधांत केवल गैर जीवन बीमा पर लागू होता है. गैर जीवन बीमा संविदा छतिपूर्ति का सिधांत कहलाता है। जीवन बीमा संविदा एक मूल्य संविदा कहलाती है।

जोखिमांकन:

किसी संविदा को करने से पहले बीमा करता यह सुनिश्चित करना चाहता है की मृत्यु दावे मे उसको कितना वित्तीय जोखिम हो सकता है. इस कार्य को करने वाले व्यक्ति को जोखिमानकनकर्ता कहते हैं। यह प्रस्तावक या बीमित की मृत्यु की संभावना का आंकलन करता है। स्वास्थ्य चिकित्सा का चिकिटसिकीय जोखिमांकन मे होता है। गैर चिकिटसिकीय जोखिमांकन मे स्वास्थ्य परीक्षण नहीं होता।

साधारण जोखिम मे प्रीमियम दर मानक रहती है वर्ना प्रस्तावक की सहमति से प्रीमियम दर ज़्यादा की जाती है। इस प्रक्रिया को जोखिमांकन कहते हैं।

ग्रहनाधिकार:

अगर प्रस्तावक/बीमित पर कोई जोखिम जो की समय के साथ घटता रहे, उस पॉलिसी पर जोखिमांकन करता प्रस्तावक की सहमति से ग्रहनाधिकार लगता है। ग्रहनाधिकार अधिकतम पॉलिसी के १/३ अंतराल तक ही लग सकता है। ग्रहनाधिकार चूंकि खण्ड के अंतर्गत नहीं आता इसलिये पॉलिसी की अनुसूची मे लिखा जाता है।

बीमानकक:

वो अधिकारी जो प्रीमियम की गणना करने की योग्यता रखता हो।

जोखिम प्रीमियम/ निवल प्रीमियम :

मृत्यु दर पर आधारित प्रीमियम शुद्ध प्रीमियम होता है। ये आयु के साथ बढ़ता जाता है। जोखिम प्रीमियम(जोकि बीमा करता निवेश पर कमाता है) से ब्याज घटाकर निवल प्रीमियम निकला जाता है।

बोनस:

बीमानकक बोनस की गणना करके घोषित करता है। उच्च अधिशेष पर उच्च बोनस और निम्न अधिशेष पर कम बोनस मिलता है। बोनस बीमा धनराशि पर निकाला जाता है। बोनस सरल, चक्रवर्धी और प्रत्यावर्तित प्रकार का होता है। बोनस केवल सहभागिता पॉलिसी पर मिलता है।

अंतिम बॉनस पोलिसी समाप्त होने पर मिलता है। अंतिम मूल्यंकन से पहले घोशित होने वाला बोनस अन्तरिम बोनस होता है।

मुद्रा का समय मूल्य

मुद्रस्फीती के कारण समय के साथ मुद्रा का मूल्य बदल जाता है। इसलिये सेवनिव्रत्ती योजना मे इसका ध्यान रखना चाहिये।

बीमा उत्पाद :

अवधी बीमा पोलिसी अन्तराल मे मृ‍त्यु होने पर धनराशि देता है.ये बचत उत्पाद नहीं है। ये बीमा बीमित की मर्त्यु के बाद गृह रिण चुकाने आदी ज़रूरतों मे काम आ सकता है.

शुध बन्दोबस्ती योजना:

केवल परिपक्वता दावा मिलता है। मृ‍त्यु कवर नहीं। केवल बचत योजना।

बन्दोबस्ती योजना:

मृ‍त्यु और परिपक्वता दावा दोनों लाभ। सुरक्षा + बचत

धनवापसी योजना:

पोलिसी काल के दौरान निर्दिष्ट समय पर तयशुदा धन मिलता रहता है।

यूलिप:

बीमा भी, निवेश भी। प्रस्तावक की पसन्द से शेयर बाज़ार मे लगाया जाता है। घाटा और लाभ की ज़िम्मेदारी प्रस्तावक की होटी है। हलांकी प्रस्तावक अलग-अलग निधियों मे अपना फंड ले जा सकता है। ज्यादा परिवर्तन करने से निवेश जोखीम हो सकता है। आयकर अधिनियम १९६१ के तहत कर लाभ उठानe के लिये बीमा कवर कम से कम प्रेमियम का ५ गुना (२०%) होना चाहिये।

अन्युटी/ सेवानिव्रत्ती योजना

सेवानिव्रत होने के बाद येह योजनाएँ धन प्रदान करतीं हैं। अन्युटी मे ३ विशेषताएं होती हैं- तत्काल, विलंबित और गारंटी अन्युटी. संचय अवधि मे धन जमा कर के अन्युटी एक निर्दिष्ट तिथि (विहित तिथि) मे पायी जा सकती है। इस तिथि मे आप १/३ धन अपनी ज़रूरत के हिसाब से निकल सकते हैं, उसे संचय चरण कहते हैं।

सेवानिव्रत्ती धन निश्चित रहता है, अन्युटी मासिक, त्रैमासिक छ्माही या वार्षिक हो सकती है। संचय धन कर मुक्त होता है लेकिन पेंशन पर आयकर देना पड़ता है। पेंशन पाने के समय ग्राहक अपनी पेंशन किसी और बीमकर्ता से पा सकता है अगर उसमे ज़्यादा लाभ हो। इस प्रक्रिया खो खुला बाज़ार विकल्प कहते हैं।

नामांकन:

बीमित की मृत्यु के बाद जिस व्यक्ति/ व्यक्तियों को बीमा राशि मिले इस प्रक्रिया को नामांकन कहते हैं। एक बाल को भी एक विशिष्ट व्यक्ति (अपोइंटी) के साथ नामित बनाया जा सकता है. एक या उससे अधिक नामिति हो सकते हैं, इसकी कोई सीमा नहीं है।

समानउदेशन :

बीमा प्रस्तावक की संपत्ती है इसीलिये ये किसी को दी जा सकती है, जैसे की गारंटी स्वरूप रखी जा सकती है, या गिरवी रखी जा सकती है। पॉलिसी के सारे अधिकार समानउदेशित को चले जाते हैं। समानउदेशन सम्पूर्ण और सशर्त प्रकार का होता है।

व्यपगमन/ पुनर्जीवन:

अगर प्रीमियम समय पर जमा नहीं किया जाता है तो पोलस्य ग्रेस अवधि के बाद व्यपगत हो जाती है और बीमा कवर नहीं मिलता है। स्वास्थ्य प्रमाण, ब्याज सहित बकाया प्रीमियम और अतिरिक्त प्रभारी मूल्य देकर पॉलिसी को पुनर्जीवित किया जा सकता है। पॉलिसी व्यपगत होने की स्थिति मे बिना प्रीमियम दिये हुए, घटे हुए बीमा कवर प्राप्त किया जा सकता है। इसमे बीमित की मृत्यु पर कुछ लाभ बीमित के परिवार को हो सकता है।

समर्पण मूल्य:

अगर प्रस्तावक किसी कारण वश अपना धन प्राप्त करना चाहता है तो वो अपनी संविदा समाप्त कर बीमा समर्पित कर सकता है. समर्पण मूल्य चुकता मूल्य पर आधारित होता है। पॉलिसी का चुकता मूल्य पॉलिसी चलने के तीन साल के बाद के ही मिल सकता है। चुकता मूल्य समर्पण के ३० दिन के अंदर मिलता है.

न्यूनतम समर्पण मूल्य= दिये गये प्रीमियम का ३५%- पहले साल का प्रीमियम

अगर पॉलिसी का प्रीमियम निर्धारित समय तक जमा ना किया जाए तो बीमा करता पॉलिसी का मोचन निषेध कर सकता है अगर उस पर ऋण लिया गया हो।

कूलिंगऑफअवधि :

अगर पॉलिसी प्रारंभ होने के १५ दिन के अंदर प्रस्तावक पॉलिसी बंद करना चाहता है तो बीमा करता उसका प्रीमियम वापस कर पॉलिसी समाप्त कर देगा। इसको कूलिंग ऑफ अवधि या फ्रीलुक अवधि कहते हैं।

प्रस्ताव पत्र:

प्रस्ताव पत्र के द्वारा बीमा संविदा की जाती है। ये संविदा का आधार होताहै। जोखिमानकनकर्ता अपना फैसला प्रस्तावपत्र मिलने के १५ दिन के बाद देता है। स्वीकार करने के बाद पहली प्रीमियम रसीद जारी कर बीमा संविदा चालू हो जाती है।

पॉलिसी दस्तावेज़ :

ये संविदा का साक्छ्य होता है। इसमे ग्रहनाधिकार अनुसूची मे, बीमा लोकपाल की जानकारी, प्रस्तावना, घोषणा आदि की जानकारी होती है। पॉलिसी कंपनी के अधिकारी द्वारा प्रमाणित होती है। स्टांप का खर्चा भारतीय स्टांप अधिनियम के अंतर्गत होता है।

दावा:

मृत्युदावा:

पूर्ण दावा हासिल करने के ३० दिन के अंदर देय है। कोई अतिरिक्त जानकारी एक बार मे १५ दिन के अंदर ले लेनी चाहिये। शीघ्र दावे पॉलिसी शुरू होने के पहले ३ साल मे उठाये जाते हैं। बीमा करता इस स्थिति मे अधिकतम १८० दिन तक जांच कर सकता है। अगर दावा देने मे देरी होती है सामान्य बॅंक ब्याज दर से २% अधिक ब्याज के साथ देय होता है। मृत्यु दावे मे मृत्यु प्रमाण होना ज़रूरी है जो तभी मिलता है जब किसी ने म्रतक को देखा हो। वर्ना उसे गुमशुदा कहा जाता है और अदालत उसे ७ साल गुमशुदा रहने के बाद म्रत घोषित कर देगी। प्राक्रतिक आपदायें, हवा जहाज़ दुर्घटना आदि मे बिना म्रतक को देखे अधिकारी द्वारा प्रमाण दे दिया जाता है।

परिपक्वता दावा: परिपक्वता तिथि के ३० दिन के अंदर देय।

उत्तरजीविता दावा: कुच्छ संविदाओं पॉलिसी के निर्दशानुसार बिना मृत्यु के समय समय पर मिले वाली राशि.

शून्य/ शूनयीकरण संविदा

संविदाएं जिनमे बीमा हिट ही ना हो या कपट हो वो शून्य होती हैं। बीमा संविदाएं जिसमे गलत प्रदर्शन हो उन्हे शूनयीकरण संविदाएं कहते हैं।

सम्पूरक :

सम्पूरक पॉलिसी मे अतिरिक्त लाभ जोड़ देते हैं। इसका प्रीमियम बेस प्रीमियम से ३०% तक ही हो सकता है। एक बार इनका लाभ उठने पर ये समाप्त हो जाते हैं लेकिन पॉलिसी चलती रहती है। इनका बीमा राशि कभी भी मूल पोलस्य की राशि से ज़्यादा नहीं हो सकती।

मंथन:

चलती हुई पॉलिसी को बंद/समर्पित करा कर दूसरी पॉलिसी को बेचना केवल कमीशन कमाने के लिये, को मंथन कहते हैं। ये अनैतिक व्यवहार है। जितना ज़्यादा विक्रय लक्ष्य उतना मंथन। मंथन ना तो बीमा करता को लाभ देती है ना प्रस्तावक को।

निरंतरता:

पॉलिसी चलते रेहने की प्रक्रिया। ये बीमा करता को लाभ देती है और प्रस्तावक को भी. अगर निरंतरता दर ज़्यादा है इससे बीमा करता को ज़्यादा मुनाफा, बीमा धारक को ज़्यादा लाभ और बीमा अभिकर्ता को कमीशन मिलता है। अगर ये काम होगा तो सब को नुकसान होगा।

लाभ द्रष्टाँत दस्तावेज़:

इसमे ६ और १०% पर व्राधी दर को दर्शाया जाता है। यूलिप लाभ द्रष्टाँत दस्तावेज़ मे अभिकर्ता का कमीशन लिखा होता है।

विनियामक:

इरडा- इनको टोल फ्री नंबर या ए मैल से संपर्क किया जा सकता है।

बीमा लोकपाल: देश मे १२ होते हैं जो की अलग अलग जगह स्थापित होते हैं। पोलस्य धारक इनका सुझाव मान या ना मान सकते हैं, हालांकि बीमा करता पर बाध्य है इनके सुझाव या अवॉर्ड को १५ दिन के अंदर सम्मानित करे। लोकपाल कोई न्यायिक अधिकारी नहीं होता। ये केवल २० लाख की बीमा राशि तक का सुझाव या अवॉर्ड दे सकते हैं और मतभेद के १ साल तक ही जायa जा सकता है। लोकपाल अपना सुझाव ३० दिन और अवॉर्ड ३ महीने मे देता है।

उपभोक्ता मंच:

ज़िला स्तर – २० लाख

प्रदेश स्तर – १ करोड़

राष्ट्रीय स्तर- १ करोड़ से अधिक

मंच एक न्यायिक प्राधिकरण है।
आइ जी एम एस: सारे बीमा करता को एक शिकायत निवारण प्रबंधन प्रणाली बनाना अनिवार्य है.

ए एम एल : काले धन को सफेद धन मे परिवर्तित करने से रोकने के लिये बनाया गया। ५०००० से ज़्यादा का भुगतान एक दिन मे हो सकता है।

के वाइ सी: अपने ग्राहक को पहचानना जैसे कि उसका नाम एवं पते का प्रमाण लेना अनिवार्य है।

जीवन चरण:

बचपन, युवा अविवाहित, युवा विवाहित, छोटी सन्तान वाले विवाहित, बड़ी सन्तान वाले विवाहित, सेवनिरतती से पहले, पूर्व सेवानिव्रत्ती. जीवन चरण से ही ग्राहक के जोखिम वहन छमता का पता चलता है।

पूँजी वाले और बिना पूँजी वाले ग्राहक: जिनके पास विरासत होती है वो पूँजी वाले ग्राहक होते हैं। जो अपने कमाई हुए धन से अपनी दिनचर्या चलता है, वो बिना पूँजी वाले होते हैं। पूँजी वालों को अपनी पूँजी बढ़ाने कि योजना चाहियe होती है। बिना पूँजी वाले आय सुरक्षा और बचत योजना चाहते हैं।

प्रयोज्य आय: सारे खर्चों के बाद बची हुई आय को प्रयोज्य आय कहते हैं। आयु के साथ प्रयोज्य आय थोड़ी सी बढ़ जाती है ।

वास्तविक और अनुभूत ज़रूरतें:

वास्तविक ज़रूरतें व्यक्ति कि असली ज़रूरतें होती हैं और अनुभूत ज़रूरतें सोची हुई कल्पनिक होती हैं। योजना के समय वास्तविक ज़रूरतों पर ध्यान देना चाहिये.

सूष्म् बीमा :

न्यूनतम बीमा राशि: ५०००/-

अधिकतम : ५००००/- सप्ताहिक प्रीमियम

आयु प्रमाण:

मानक प्रमाण जिसमे आयु सबूत पर आधारित होती है। गैर मानक मे मौखिक घोषणा होती है।

अभिकर्ता:

स्वदेशी और मानसिक तौर पर स्वास्थ्य होना मुख्य योग्यता है। अभिकर्ता पहला जोखिमनकर्ता होता है।

तथ्य अन्वेषण :

ग्राहक कि ज़रूरतों को जानने मापने और प्राथमिकता देने के लिये होता है।

विविध:

समाचार पत्र मे विग्यापन या छतिपूर्ति बॉण्ड भरने का मतलब पॉलिसी खो गयी है। अभिकर्ता का सुझाव व्यवसायिक है अगर वो ग्राहक के हित मे है। अगर ग्राहक अभिकर्ता के सुझाव से सहमत नहीं है तो अभिकर्ता को कारण पूछना चाहता है। सोने को इकाइयों मे बदलने से तरलता बढ़ जाती है। आपातकालीन निधि के लिये सबसे बेहतर जगह बॅंक और म्यूचुयल फंड है. जो स्वास्थ्य और संपत्ती मे निवेश कर रहा है वो सेवानिव्रत्ती आयु मे है।

ई एम आई मासिक वेतन से ४०% से अधिक नहीं होना चाहिए। पेहली प्रीमियम रसीद के जारी होने के बाद बीमा कवर चालू हो जाता है

अधिकतम च्छूट धारा ८०सी के तहत १ लाख रुपये है। दावा आयकर अधिनियम १९६१ १०(१०) डी के तहत कर मुक्त होता है.